दर्द का आलम बढ़ता जा रहा थाये तन्हा दिल, और तन्हा होता जा रहा थाज़िंदगी की शाम ढलने को थीये क़िस्सा अपने अंजाम तक जा रहा था मैं फिर भी बैठा इत्मीनान सेअपने क़िस्से सुना रहा थावो कमबख़्त भी वहीं खड़ा थामेरा करतब देख पैसे उछाल रहा था
ये मंज़र हमसे देखा न गयादिल ख़ुद पर सवाल उठा रहा थाऔर कैसे कैसों से दिल्लगी कर बैठे थे हमये सवालहमें अंदर ही अंदर खाता जा रहा था
~दरार