जहाँ-जहाँ न जाने थे, वहाँ-वहाँ मेरे क़दम गएये हम ही जानते हैं कैसे हम टुकड़ा-टुकड़ा बिखर गए चल रही थी थी अज़ाब की आँधी, और ग़मों की धूपहम निकल तो आए सहरा में, मगर घर बनाना भूल गए और अब ढूँढते हैं लोगों में जाने कैसी पनाह हमहम ऐतबार करते करते, दिल लगाना भूल गए
गँवा बैठे हैं एक हिस्सा अपनादलीलें पेश करते करते, हम ख़ुद ही को समझाना भूल गए
~दरार