कुछ ख़र्च हो जाऊँ मैं,कुछ ख़र्च हो जाओ तुमया बेहतरी है इसमें मेरी,महज़ एक याद हो जाओ तुम मिलो अगर तो संध्या सीबात करो तो कविता सीया बेहतरी है इसमें मेरी,दूर रहो तुम चंदा सी
बहो अगर तो दरिया सीकहो अगर तो नज़रिया सीया बेहतरी है इसमें मेरीओझल हो जाओ किसी नदियाँ सी रूह जुड़े तो एक नाम सीरब्त न हो बस काम कीया बेहतरी है इसमें मेरीतुम मिलो ही न ज़ख़्म-ए-आराम सी
~दरार