पहले यूँ था किकुछ देर थोड़ा और सो केरातों को थोड़ा रास्तों का हो केवक़्त बे-वक़्त की आवारा गर्दी सेख़ुद की रूह को थोड़ा सुकून दे के
पर अबहालत-ए-दिल ये हैकि पड़े रहते हैं अपने सुकूत के संगये हिकायतें सारी माज़ी की हैंन जाने ज़िंदगी दिखा रही है कैसे रंगयारों को पीछे छोड़ दिया है हमनेटूटे घरों की हिदायत दे के
~दरार