daraar.

ग़ज़ल2026

तेरी आदत

तेरे हाथों की जबसे आदत हुई मुझेहूरों की हम-नसीबी हुई मुझेउस पर तेरा ये मुस्कुरानातेरे इतराने की आदत हुई मुझे

अपने नसीब के शजर तेरे नाम कर देता हूँतेरी ज़ुल्फ़ों की आदत हुई मुझेअच्छे लगते नहीं मुझे अब फूल गुलशन केतेरे गालों की आदत हुई मुझे कोई नशा घुलने लगा है फ़िज़ाओं मेंतेरी आने की आहट हुई मुझेनज़ारों से कोई बैर नहीं रखता मैंपर तेरे चेहरे की आदत हुई मुझे