एक अरसा हो गया है रातों को सियाह करते हुएआँखों के नीचे धब्बे पड़ते, और उभरते हुए कुछ ग़ज़लें, नज़्में, मन करता है तो लिख लेता हूँनहीं तो बीतता है हर लम्हा यूँही सोचते हुए कोई कितना ही सोचेगा तेरी याद टटोलते हुएअब थक गया है दरार ख़ुदको कोसते हुए
और शायद तेरा न मिलना ही ज़रूरी थावरना आँखें नम कैसे होतीं, ये ग़ज़लें बोलते हुए
~दरार