फिर वही शाममुद्दतों से आई जा रही हैग़मों की स्याहीकिसी तरह चलाई जा रही है इन लम्हों नेइस दिल को बंजर कर दिया हैअज़ाब की गली मेंफिर से बातें सुनाई जा रही हैं
सोचता हूँइंसानियत कोई ख़्वाब तो नहींलेकिन ये भी सच हैसलाहें बरसाई जा रही हैं पर मसला ये हैकि अगर हाथ फैलाऊँ मैंये भी मुमकिन हैजवाबदारी दिखलाई जा रही है