daraar.

मुक्त छंद

फिरसे शाम का वक़्त हो चला हैरूह का अश्क़ों से रब्त हो चला है हम भी तैयार बैठे थे,रायगाँ की हिकायतों के ख़ातिर पर चलोअब सोने का वक़्त हो चला है

~दरार