daraar.

नज़्म

तेरे बाद सवालों का कारवाँमेरे साथ चलता हैसुबह का सूरज, शाम कोयादों में ढलता है पूछता है आख़िर क्योंये शब-ए-ग़म रोज़ चला आता हैतेरा मुझसे क्या रब्त है बाक़ीजो तू हर रोज़ सताता है

ये क़ैदी अब तुझसे रिहाई कीभीख माँगता हूँन जाने ये सितम करने का सलीक़ातू कहाँ से लाता है और आदतन मैं थक हार केफिरसे उस जंगल की ओर निकल पड़ा हूँजहाँ महज़ अँधेरा हैपर मेरा दिल सुकून तलाशता है